राजनीति

Noida Protest: नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन पर राहुल गांधी बोले-मजदूर देश की रीढ़, सरकार ने उन्हें बोझ समझ लिया

Rahul Gandhi: कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने नोएडा में विभिन्न कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन पर मंगलवार को कहा कि मजदूर देश की रीढ़ हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने उन्हें बोझ समझ लिया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने मजदूरों का समर्थन किया। यह दावा भी किया कि सरकार ने पिछले साल चार श्रम संहिताओं को जल्दबाजी में लागू किया, जिससे रोजाना काम के घंटे बढ़कर 12 हो गए, लेकिन श्रमिकों के मानदेय में कोई वृद्धि नहीं हुई।

कहा, बेलगाम महंगाई
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि कल नोएडा की सड़कों पर जो हुआ, वो इस देश के श्रमिकों की आखिरी चीख थी – जिसकी हर आवाज को अनसुना किया गया, जो मांगते-मांगते थक गया। नोएडा में काम करने वाले एक मजदूर की 12,000 रुपये महीने की तनख्वाह, 4,000-7,000 रुपये किराया। जब तक 300 रुपये की सालाना बढ़ोतरी मिलती है, मकान मालिक 500 रुपये सालाना किराया बढ़ा देता है। तनख्वाह बढ़ने तक ये बेलगाम महंगाई जिंदगी का गला घोंट देती है, कर्ज की गहराई में डुबा देती है – यही है विकसित भारत का सच।

महंगाई की मार
राहुल के मुताबिक, एक महिला मजदूर ने कहा कि गैस के दाम बढ़ते हैं, पर हमारी तनख्वाह नहीं। इन लोगों ने शायद इस गैस संकट के दौरान अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए 5000 रुपये का भी सिलेंडर खरीदा होगा। यह सिर्फ नोएडा की बात नहीं है। और यह सिर्फ भारत की भी बात नहीं है। दुनियाभर में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं – पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से सप्लाई चेन टूट गई है। मगर, अमेरिका के टैरिफ वॉर, वैश्विक महंगाई, टूटती सप्लाई चेन – इसका बोझ मोदी के मित्र उद्योगपतियों पर नहीं पड़ा। इसकी सबसे बड़ी मार पड़ी है उस मजदूर पर जो दिहाड़ी कमाता है, तभी रोज खाता है। वो मजदूर, जो किसी युद्ध का हिस्सा नहीं, जिसने कोई नीति नहीं बनाई – जिसने बस काम किया। चुपचाप। बिना शिकायत। और उसके बदले अपना हक मांगने पर उन्हें मिलता क्या है? दबाव और अत्याचार।

कहा, मैं हर उस मजदूर के साथ हूं – जो इस देश की रीढ़ है और जिसे इस सरकार ने बोझ समझ लिया
राहुल ने कहा कि एक और जरूरी मुद्दा – मोदी सरकार ने चार लेबर कोड जल्दबाजी में बिना संवाद नवंबर, 2025 से लागू कर, काम का समय 12 घंटे तक बढ़ा दिया। जो मजदूर हर रोज 12-12 घंटे खड़े होकर काम करता है फिर भी बच्चों की स्कूल फीस कर्ज लेकर भरता है – क्या उसकी मांग गैरवाजिब है? और जो उसका हक हर रोज मार रहा है – वो विकास कर रहा है?नोएडा का मजदूर 20,000 रुपये मांग रहा है। यह कोई लालच नहीं – यह उसका अधिकार, उसकी जिंदगी का एकमात्र आधार है। मैं हर उस मजदूर के साथ हूं – जो इस देश की रीढ़ है और जिसे इस सरकार ने बोझ समझ लिया है। (सारा जहां न्यूज नेटवर्क)

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