Deadly Music System : म्यूजिक सिस्टम की कानफोड़ू आवाज हो सकती है जानलेवा, जानें-तेज आवाज को लेकर क्या है कानून, जा सकते हैं जेल

Deadly Music System: म्यूजिक सिस्टम की कानफोड़ू आवाज जानलेवा हो सकती है। जानलेवा म्यूजिक सिस्टम की वजह से अब तक कई लोगों की जान भी जा चुकी है। लोग तेज म्यूजिक के चक्कर में कार में बहुत हैवी सिस्टम लगवा लेते हैं। इसकी वजह से बैटरी खराब हो जाती है। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि कार में आग तक लग जाती है। देश में इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं।
जानलेवा म्यूजिक सिस्टम, युवक की गई जान
अभी हाल में छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में सिस्टम की तेज आवाज के कारण एक युवक की मौत हो गई। 40 वर्षीय युवक को सिर की नस फटने के बाद अस्पताल में भर्ती किया गया। जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। प्रशासन ने 65 डेसिबल तक के साउंड सिस्टम की अनुमति दी है, लेकिन 120 से अधिक डेसिबल आवाज में सिस्टम बजाया जा रहा है।
जानलेवा म्यूजिक सिस्टम की वजह से इनकी भी जा चुकी है जान
जानलेवा म्यूजिक सिस्टम की वजह से इससे पहले मध्य प्रदेश में एक 60 वर्षीय बुजुर्ग की भी मौत हो चुकी है। महाराष्ट्र में एक कार्यक्रम के दौरान तेज आवाज से अप्रैल में 250 लोग बीमार पड़ गए थे। सिस्टम की तेज आवाज लोगों की मौत का कारण बनती जा रही है।
जागरूक होने की है जरूरत
आम तौर पर इंसान 80 डेसिबल तक की ध्वनि को सुन सकता है, लेकिन म्यूजिक सिस्टम का शोर कितना होता है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। बीमार, बुजुर्ग और बच्चों के लिए यह सबसे घातक होता है। नौजवान की मौत ने फिर से सबको सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह घटना हमें बताती है कि ध्वनि प्रदूषण कितना खतरनाक हो सकता है। हमें अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जागरूक होने की जरूरत है। म्यूजिक सिस्टम को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्ति पर रोक लगाने की आवश्यकता है। जागरूक होकर हम स्वयं आगे आएंगे, तब ही प्रशासन की सख्ती का प्रभाव दिखाई देगा।
जानें, क्या है कानून?
भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 268 में ऐसा करने को पब्लिक न्यूसेंस माना जाता है। इस क्राइम के लिए IPC की धारा 290 में जुर्माना का प्रावधान किया गया है। वहीं दूसरी बार इस क्राइम को करने पर आरोपी को जुर्माना देने के साथ जेल भी जाना पड़ सकता है। ऐसे में अपराध को दोबारा करने पर IPC की धारा 291 में जुर्माने के साथ 6 महीने की जेल की सजा का प्रावधान है। शिकायत मिलने पर मजिस्ट्रेट स्तर का अधिकारी मामले की जांच करता है और अगर उसे लगता है कि किसी के लाउडस्पीकर बजाने से पब्लिक न्यूसेंस पैता होता है तो उसे हटाने का आदेश दे सकता है। दण्ड प्रक्रिया संहिता यानी CRPC की धारा 133 मजिस्ट्रेट को ऐसा आदेश देना का शक्ति प्रदान करती है।
रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक लाउडस्पीकर प्रयोग की मनाही
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवने जीने के अधिकार के तहत ध्वनि प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहने के अधिकार को भी शामिल किया गया है। अभी देशभर में चल रहे लाउडस्पीकर विवाद के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी, साथ ही मस्जिद पर लाउडस्पीकर लगाने की मांग को लेकर दाखिल याचिका भी खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि लाउडस्पीकर लगाना मौलिक अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक लाउडस्पीकर का प्रयोग से मनाही है।
ध्वनि प्रदूषण को मापने का ये हैं पैमाना
ध्वनि प्रदूषण को मापने का पैमाना डेसिबल होता है। माना जाता है कि 80 डेसिबल तक की आवाज आदमी की बर्दाश्त कर सकता है, इससे ज्यादा की आवाज ध्वनि प्रदूषण के दायरे में आती है और इसका खराब असर पड़ता है। एक सामान्य व्यक्ति 0 डेसिबल तक की आवाज़ सुन सकता है। यह आवाज पेड़ के पत्तों की सरसराहट जितनी आवाज़ होती है। वहीं हम घर में सामान्य तौर पर जो बातचीत करते हैं उस समय हमारी आवाज 30 डेसिबल के आसपास होती है। एक लाउडस्पीकर सामान्य तौर पर 80 से 90 डेसिबल की आवाज पैदा करता है।
जानें, ध्वनि प्रदूषण अधिनियम नियम, 2000
ध्वनि प्रदूषण अधिनियम नियम, 2000 के मुताबिक कामर्शिलय और रेजिडेंशियल इलाकों के लिए आवाज की सीमा तय की गई है। इसके अनुसार, इंडस्ट्रियल इलाकों के लिए दिन में 75 डेसिबल और रात में 70 डेसिबल आवाज की सीमा होनी चाहिए। कामर्शिलय इलाकों के लिए आवाज की सीमा दिन में 65 डेसिबल और रात में 55 डेसिबल होनी चाहिए। वहीं रेजिडेंशियल इलाकों के लिए दिन में 50 और रात में 40 डेसिबल की सीमा तय की गई है। (सारा जहां न्यूज नेटवर्क)



