OP Singh: हरियाणा के डीजीपी ने साझा किया जीवन संघर्ष, कहा-अच्छा वक्त गोली की तरह निकल जाता है, बुरा काटे नहीं कटता; पुलिस के जवानों को भी चाहिए जादू की झप्पी

OP Singh: हरियाणा (Haryana) के डीजीपी (DGP) ओपी सिंह (OP Singh) ने सोशल मीडिया एक्स पर अपने अनुभव और जीवन संघर्ष साझा किया है। उनके मुताबिक, पुलिस के जवान बदमाशों से खुलेआम दिन-रात बिना डरे-थके लड़ते है। घर अकेले जाते हैं। अकेले रहते हैं। इन्हें चाहिए जादू की झप्पी (Jadoo Ki Jhappi)।
बिना रुके चलता है समय
समय वर्तमान से भविष्य की ओर बिना रुके चलता रहता है। इसे कोई परवाह नहीं है कि कोई सो रहा है कि जाग रहा है। पहिया घूमता ही रहता है। एक और बात समय समय में बड़ा फर्क होता है। अच्छा गोली की तरह निकल जाता है, बुरा काटे नहीं कटता।
अगर आपके पास किसी समस्या का समाधान है तो दुनियां आपकी है
सुविधा के लिए आदमी ने समय को मापना शुरू किया। सेकंड, मिनट, घंटे, दिन, महीने, साल सब इसी के दिमाग की उपज है। शुरू के बीस-पचीस साल इस बात के लिए है कि आप अपने को किसी बीमारी का इलाज घोषित करें। जिसको दरकार होगी वो आपको ढूंढ लेगा। उसका काम हो जाएगा। आप बाजार में फिट हो जाएंगे। किसी को बताना नहीं पड़ेगा कि आप क्या कर रहे हैं। चीजें मांगनी नहीं पड़ेगी, आप खरीद पाएंगे। बेरोजगारी के शोर-शराबे के बीच मेरा अब भी मानना है कि अगर आपके पास किसी समस्या का समाधान है तो दुनियां आपकी है।
इतना था हौसला
लोग पूछते हैं कि आईपीएस में आने का ख्याल कब आया? मेरा जवाब होता है कभी नहीं। स्कूल-कालेज के साल मजे में कटे। परीक्षाएं हाथ दिखाने का अवसर होती थी। हौसला इतना था कि लगता था कि जो एक दो हाथ-पैर का आदमी कर सकता है, मैं भी कर सकता हूं। किसी ने कह दिया कि सिविल सेवा की परीक्षा दुनियां के जटिलतम में से एक है। मैंने कहा कि देखते हैं। टहलते हुए आईपीएस में पहुंच गया। संघर्ष या तो था नहीं या मुझे पता ही नहीं चला।
बदमाशों का कुछ बिगड़ता नहीं, भलों के लिए इज्जत बचानी मुश्किल होती
जिस भू और काल खंड से मैं आया हूं, वहां सरकारें नदारद थी। भले की तो भूल जाइए। बुरे में भी बुरा से बुरा हो जाने के बाद ही पहुंचती थी। वो भी एक अतिरिक्त समस्या बनकर। इनके गाली-गलौज के शौक और लूट-बेगार के जुनून से बचने के लिए दैवीय कृपा से कम से काम चलने का मतलब ही नहीं होता था। बदमाशों का कुछ बिगड़ता नहीं था। भलों के लिए इज्जत बचानी मुश्किल होती थी।
गलती और बेवकूफी के लिए माफ करो, बदमाशी और ठगी के लिए तो बेशक रगड़ दो
व्यवस्था कुछ ऐसी थी कि घर से हजारों मील दूर पहुंच गए। अब जब मैं खुद ही सरकार था सो पहले दिन ही ठान लिया कि समाधान बनूंगा। जिले और रेंज में रहे तो अपने मातहतों को कहते रहे कि लोगों पर तरस खाओ। हजारों साल की गुलामी के बाद पहली बार राहत की सांस ले रहे हैं। कानून समझने की कोशिश कर रहे हैं। गलती और बेवकूफी के लिए माफ करो। बदमाशी और ठगी के लिए तो बेशक रगड़ दो। जो खुद नहीं करते वो सुविधा दूसरे को कहां से दें? जो मेरे ऊपर थे उनको कहा कि जिस बात से किसी के फायदे के लिए मेरा या किसी अन्य का नुकसान ना होता हो, बेझिझक फरमाएं। तब का दिन है और आज। चौतीस साल हो गए हैं। मुझे कभी कोई दिक्कत नहीं आई।
लोग जब मेडल के जश्न में डूबे थे, मैंने बच्चों को खेल में मैदान में लाने की ठानी
कुछ बड़ा करने की सोच ने मुझे हमेशा चलाए रखा है। शुरू के दिनों में एक ओहदेदार के बारे में किसी ने बताया कि इन्होंने सर्व शिक्षा अभियान नाम की बड़ी स्कीम चलाई है। फौरन दिमाग में आया कि मैं भी कुछ ऐसा ही करूंगा। सालों बाद सरकार ने खेल विभाग का जिम्मा दिया। लोग जब मेडल के जश्न में डूबे थे, मैंने बच्चों को खेल में मैदान में लाने की ठानी। दिव्यांग खिलाड़ियों को बराबरी का दर्जा दिलाने की सोची। अनुसूचित जाति के खिलाड़ियों के लिए विशेष प्रोत्साहन को प्राथमिकता बनाया। मुझे किसी ने नहीं रोका। स्पैट स्कालरशिप स्कीम में हर साल पंद्रह लाख बच्चे भाग लेते थे। स्टेडियम तीन महीने खचाखच भरा रहता था। दिव्यांग और सामान्य वर्ग के खिलाड़ियों को एक जैसी सुविधाएं मिलने लगी। फेयरप्ले स्टाइपेंड स्कीम में वंचित जाति के खिलाड़ियों को हजारों रुपये का मासिक स्टाइपेंड मिलने लगा। प्ले फॉर इंडिया स्कीम ने हरियाणा को पूरे देश में खेलों को प्रोत्साहित करने वाला अग्रणी राज्य बना दिया।
चुनौती स्वीकार करने का क्रम ऐसे ही चलता रहा
चुनौती स्वीकार करने का क्रम ऐसे ही चलता रहा। सवेरे की दौड़ में मेरे एक कोच ने कहा कि न्यूजीलैंड में एक रनर है, जिसके साथ घड़ी मिलाकर बीसियों शहर में पांच हजार लोग दौड़ते हैं। तलवार फिर खींच गई। मैंने कहा कि एक दिन मैं अपने साथ पचास हजार को दौड़ाऊंगा।
लोगों से सरोकार रखने के लिए जिला मैराथन की तरकीब भिड़ाई
सालों बाद जब पुलिस में लौटा, तो एसएचओ को थाने से बाहर निकलने और लोगों से सरोकार रखने के लिए मैंने जिला मैराथन की तरकीब भिड़ाई। उनको कहा कि आप अपने इलाके के पचास ऐसे लोगों से वर्किंग रिलेशन बनाओ जिनके प्रभाव में बीस-तीस लड़के-बच्चे हों। मैं दस दिन के नोटिस में साल में एक बार जिला मैराथन कराऊंगा। आपको इन सबको उसमें भाग लेने के लिए प्रेरित करना है। सोच थी कि इसी बहाने वे थाने से बाहर निकलेंगे, गाड़ियों से उतरेंगे, लोगों से बात करेंगे। मेरी मानना है कि जिस थानेदार की पहुंच हजार लोगों तक है, वो कभी मार नहीं खा सकता। पहले आयोजन में ही पचास हजार लोग उत्साह पूर्वक दौड़े। (सारा जहां न्यूज नेटवर्क)



