Dynastic Politics: वंशवाद की राजनीति का दंश झेल रही जनता

वंशवाद की राजनीति (Dynastic Politics) का दंश भारत देश आजादी के बाद से झेल रहा है। वंशवाद में किसी भी नेता की यही चाहत होती है कि उसके सक्रिय रहते ही उसका बेटा, बेटी, पत्नी व उसके परिवार का ही कोई अन्य सदस्य उसकी विरासत संभाल ले। वंशवादी राजनीति की इसी विषबेल का नतीजा यह है कि आज राजनीति में जो नई पौध आ रही है, उसका जमीनी हालात से जुड़ाव बहुत कम रहा है।
ऐसे जनप्रतिनिधि आश्वस्त रहते हैं कि अगले चुनाव में उनका टिकट पक्का है, इस कारण जनकल्याण की उनकी प्राथमिकता दोयम रहती है। आम जनता के हित में नीतियां बनाने व उसे प्रभावी तरीके से लागू करने में खास दिलचस्पी नहीं लेते है। देश में वंशवादी सियासत पर लगाम लगाने को लेकर 78वें स्वतंत्रता दिवस पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि राजनीतिक पार्टियां आम युवाओं को देश की राजनीति का हिस्सा बनाने की पहल करें। ये युवा जमीन से जुड़े होते हैं। आम जन के हर सुख-दुख से परिचित होते हैं।
भारतीय राजनीति में वंशवाद का जन्म 1952 के चुनाव में हुआ था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इंदिरा गांधी को अपना वारिस करार दिया था। ऐसा नहीं था कि उस वक्त कांग्रेस में और सक्षम नेता नहीं थे। नेहरू के समय से गांधी और नेहरू परिवार का जो सिलसिला चला, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है। इंदिरा के बाद संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने कांग्रेस की पतवार संभाली है। (सारा जहां न्यूज नेटवर्क)



