Khatu Shyam: जानें, ‘खाटू श्याम’ को क्यों कहा जाता है ‘हारे का सहारे’, इनके दर्शन से दूर हो जाते हैं सारे दुख

खाटूश्याम (Khatu Shyam) को हारे का सहारा (Hare Ka Sahara) कहा जाता है। भारत (Bharat) में राजस्थान (Rajasthan) के सीकर (Sikar) जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर (Khatushyam Temple) में प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु शीश नवाने के लिए आते हैं। बाबा शाम (Baba Shyam) को लखदातार (Lakhdatar) भी कहा जाता है। कहा जाता है कि इनके दर्शन मात्र से भक्तों के सभी दुख और कष्ट दूर हो जाते हैं।
जानें, बाबा श्याम का असली नाम
महाभारत (Mahabharata) में वर्णित है कि भीम (Bhim) के पुत्र घटोत्कच (Ghatotkacha) थे। बर्बरीक (Barbarika) उन्हीं के पुत्र थे। बर्बरीक देवी मां के भक्त थे। बर्बरीक की तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर देवी मां ने उन्हें तीन तीर दिए थे, जिनमें से एक तीर से संपूर्ण वे पृथ्वी का विनाश कर सकते थे। ऐसे में जब महाभारत का युद्ध चल रहा था, तो बर्बरीक ने अपनी माता हिडिंबा (Hidimba) से युद्ध लड़ने की पेशकश की। तब बर्बरीक की माता ने सोचा कि कौरवों की सेना बड़ी है और पांडवों की सेना छोटी, इसलिए शायद युद्ध में कौरव पांडवों पर भारी पड़ेंगे। तब हिडिंबा ने कहा कि तुम हारने वाले के पक्ष में युद्ध लड़ोगे।
श्रीकृष्ण ने दान में मांगा लिया था शीश
माता हिडिंबा की आज्ञा लेकर बर्बरीक महाभारत के युद्ध में शामिल होने के लिए निकल पड़े। भगवान श्रीकृष्ण (Bhagwan Shrikrishna) को पता था कि जीत पांडवों की होने वाली है। अगर बर्बरीक युद्ध स्थल पर पहुंचते हैं, तो वे कौरव पक्ष में युद्ध लड़ेंगे। इसलिए भगवान श्रीकृष्णा भिक्षु का रूप धारण कर बर्बरीक के पास पहुंचे। भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उनका शीश दान में मांग लिया।
इसलिए कहलाए हारे का सहारा
दानशीलता के कारण बर्बरीक ने बिना किसी सवाल के अपना शीश भगवान श्री कृष्ण को दान दे दिया। इसी दानशीलता के कारण श्रीकृष्ण ने कहा कि तुम कलयुग में मेरे नाम से पूजे जाओगे, तुम्हें कलयुग में श्याम के नाम से पूजा जाएगा, तुम कलयुग का अवतार कहलाओगे और ‘हारे का सहारा’ बनोगे।
नदी में बहकर खाटू आया था श्याम का शीश
घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने जब भगवान श्रीकृष्ण को अपना शीश दान में दिया, तो बर्बरीक ने महाभारत का युद्ध देखने की इच्छा जताई, तब श्रीकृष्ण ने उनके शीश को ऊंचाई वाली जगह पर रख दिया। तब बर्बरीक ने संपूर्ण महाभारत का युद्ध देखा। युद्ध समाप्ति के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के शीश को गर्भवती नदी में बहा दिया। ऐसे में गर्भवती नदी से बर्बरीक यानी बाबा श्याम का शीश बहकर खाटू (उसे समय की खाटूवांग नगरी) आ गया। खाटूश्याम में गर्भवती नदी 1974 में लुप्त हो गई थी।
श्याम कुंड में मिला था बाबा श्याम का शीश
स्थानीय लोगों के अनुसार, पीपल के पेड़ के पास प्रतिदिन एक गाय अपने आप दूध देती थी। ऐसे में लोगों को हैरानी हुई, तो उन्होंने उसे जगह खुदा तो बाबा श्याम का शीश निकला। बाबा श्याम का यह शीश फाल्गुन मास की ग्यारस को मिला था। इसलिए बाबा श्याम का जन्मोत्सव भी फाल्गुन मास की ग्यारस को ही मनाया जाता है। खुदाई के बाद ग्रामीणों ने बाबा श्याम का शीश चौहान वंश की नर्मदा देवी को सौंप दिया। इसके बाद नर्मदा देवी ने गर्भ गृह में बाबा श्याम की स्थापना की और जिस जगह बाबा श्याम को खोदकर निकाला गया, वहां पर श्याम कुंड (Shyam Kund) बना दिया गया। कहा जाता है कि यहां आने वाले हर भक्त की खाटूश्याम मुराद पूरी करते हैं। उसके दुख-दर्द दूर करते हैं। उसका सहारा बनने हैं। इसीलिए यहां आने वाले भक्तों की संख्या नित बढ़ रही है। (सारा जहां न्यूज नेटवर्क)
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